Stotram - Sacred Scripture

Sri Rama Charita Manasa

Sri Rama Charita Manasa

Stotram
Rama
65 Verses
110%

श्री राम चरित मानस - सुन्दरकाण्ड

श्लोक 1

श्रीजानकीवल्लभो विजयते

श्रीरामचरितमानस

पञ्चम सोपान (सुन्दरकाण्ड)

शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं

ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम् ।

रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं

वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूड़आमणिम्

श्लोक 2

नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये

सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।

भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे

कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च

॥ 1 ॥

श्लोक 3

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं

दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।

सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं

रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि

॥ 2 ॥

श्लोक 4

जामवन्त के बचन सुहाए। सुनि हनुमन्त हृदय अति भाए ॥

तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कन्द मूल फल खाई ॥

जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी ॥

यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा ॥

सिन्धु तीर एक भूधर सुन्दर। कौतुक कूदि चढ़एउ ता ऊपर ॥

बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी ॥

जेहिं गिरि चरन देइ हनुमन्ता। चलेउ सो गा पाताल तुरन्ता ॥

जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना ॥

जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी ॥

दो. हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।

राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम

॥ 3 ॥

श्लोक 5

जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा ॥

सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठिन्हि आइ कही तेहिं बाता ॥

आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा ॥

राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कि सुधि प्रभुहि सुनावौम् ॥

तब तव बदन पैठिहुँ आई। सत्य कहुँ मोहि जान दे माई ॥

कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना ॥

जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा ॥

सोरह जोजन मुख तेहिं ठयू। तुरत पवनसुत बत्तिस भयू ॥

जस जस सुरसा बदनु बढ़आवा। तासु दून कपि रूप देखावा ॥

सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा ॥

बदन पिठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा ॥

मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मै पावा ॥

दो. राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।

आसिष देह गी सो हरषि चलेउ हनुमान

॥ 1 ॥

श्लोक 6

निसिचरि एक सिन्धु महुँ रही। करि माया नभु के खग गही ॥

जीव जन्तु जे गगन उड़आहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीम् ॥

गहि छाहँ सक सो न उड़आई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई ॥

सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा ॥

ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयु मतिधीरा ॥

तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुञ्जत चञ्चरीक मधु लोभा ॥

नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृन्द देखि मन भाए ॥

सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढेउ भय त्यागेम् ॥

उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई ॥

गिरि पर चढि लङ्का तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी ॥

अति उतङ्ग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा ॥

छं=कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुन्दरायतना घना।

चुहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना ॥

गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै ॥

बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै

॥ 2 ॥

श्लोक 7

बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।

नर नाग सुर गन्धर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीम् ॥

कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।

नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीम्

॥ 1 ॥

श्लोक 8

करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।

कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीम् ॥

एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।

रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही

॥ 2 ॥

श्लोक 9

दो. पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।

अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पिसार

॥ 3 ॥

श्लोक 10

मसक समान रूप कपि धरी। लङ्कहि चलेउ सुमिरि नरहरी ॥

नाम लङ्किनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निन्दरी ॥

जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा ॥

मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी ॥

पुनि सम्भारि उठि सो लङ्का। जोरि पानि कर बिनय संसका ॥

जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरञ्चि कहा मोहि चीन्हा ॥

बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर सङ्घारे ॥

तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता ॥

दो. तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अङ्ग।

तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसङ्ग

॥ 3 ॥

श्लोक 11

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कौसलपुर राजा ॥

गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिन्धु अनल सितलाई ॥

गरुड़ सुमेरु रेनू सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही ॥

अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना ॥

मन्दिर मन्दिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा ॥

गयु दसानन मन्दिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीम् ॥

सयन किए देखा कपि तेही। मन्दिर महुँ न दीखि बैदेही ॥

भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मन्दिर तहँ भिन्न बनावा ॥

दो. रामायुध अङ्कित गृह सोभा बरनि न जाइ।

नव तुलसिका बृन्द तहँ देखि हरषि कपिराइ

॥ 4 ॥

श्लोक 12

लङ्का निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा ॥

मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा ॥

राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा ॥

एहि सन हठि करिहुँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी ॥

बिप्र रुप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषण उठि तहँ आए ॥

करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई ॥

की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई ॥

की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी ॥

दो. तब हनुमन्त कही सब राम कथा निज नाम।

सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम

॥ 5 ॥

श्लोक 13

सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी ॥

तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा ॥

तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीम् ॥

अब मोहि भा भरोस हनुमन्ता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं सन्ता ॥

जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा ॥

सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती ॥

कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चञ्चल सबहीं बिधि हीना ॥

प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा ॥

दो. अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।

कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर

॥ 6 ॥

श्लोक 14

जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी ॥

एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा ॥

पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही ॥

तब हनुमन्त कहा सुनु भ्राता। देखी चहुँ जानकी माता ॥

जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवनसुत बिदा कराई ॥

करि सोइ रूप गयु पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ ॥

देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा ॥

कृस तन सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी ॥

दो. निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।

परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन

॥ 7 ॥

श्लोक 15

तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करि बिचार करौं का भाई ॥

तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। सङ्ग नारि बहु किएँ बनावा ॥

बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा ॥

कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मन्दोदरी आदि सब रानी ॥

तव अनुचरीं करुँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा ॥

तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही ॥

सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करि बिकासा ॥

अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की ॥

सठ सूने हरि आनेहि मोहि। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही ॥

दो. आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।

परुष बचन सुनि काढ़इ असि बोला अति खिसिआन

॥ 8 ॥

श्लोक 16

सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहुँ तव सिर कठिन कृपाना ॥

नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी ॥

स्याम सरोज दाम सम सुन्दर। प्रभु भुज करि कर सम दसकन्धर ॥

सो भुज कण्ठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा ॥

चन्द्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल सञ्जातम् ॥

सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा ॥

सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा ॥

कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई ॥

मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़इ कृपाना ॥

दो. भवन गयु दसकन्धर इहाँ पिसाचिनि बृन्द।

सीतहि त्रास देखावहि धरहिं रूप बहु मन्द

॥ 9 ॥

श्लोक 17

त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका ॥

सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना ॥

सपनें बानर लङ्का जारी। जातुधान सेना सब मारी ॥

खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुण्डित सिर खण्डित भुज बीसा ॥

एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लङ्का मनहुँ बिभीषन पाई ॥

नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई ॥

यह सपना में कहुँ पुकारी। होइहि सत्य गेँ दिन चारी ॥

तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीम् ॥

दो. जहँ तहँ गीं सकल तब सीता कर मन सोच।

मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच

॥ 10 ॥

श्लोक 18

त्रिजटा सन बोली कर जोरी। मातु बिपति सङ्गिनि तैं मोरी ॥

तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसहु बिरहु अब नहिं सहि जाई ॥

आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई ॥

सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी ॥

सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि ॥

निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी ॥

कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलहि न पावक मिटिहि न सूला ॥

देखिअत प्रगट गगन अङ्गारा। अवनि न आवत एकु तारा ॥

पावकमय ससि स्त्रवत न आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी ॥

सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका ॥

नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना ॥

देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता ॥

सो. कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारी तब।

जनु असोक अङ्गार दीन्हि हरषि उठि कर गहेउ

॥ 11 ॥

श्लोक 19

तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अङ्कित अति सुन्दर ॥

चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी ॥

जीति को सकि अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई ॥

सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना ॥

रामचन्द्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा ॥

लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई ॥

श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कहि सो प्रगट होति किन भाई ॥

तब हनुमन्त निकट चलि गयू। फिरि बैण्ठीं मन बिसमय भयू ॥

राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की ॥

यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी ॥

नर बानरहि सङ्ग कहु कैसें। कहि कथा भि सङ्गति जैसेम् ॥

दो. कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास ॥

जाना मन क्रम बचन यह कृपासिन्धु कर दास

॥ 12 ॥

श्लोक 20

हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ई। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ई ॥

बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयु तात मों कहुँ जलजाना ॥

अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी ॥

कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई ॥

सहज बानि सेवक सुख दायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक ॥

कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहि निरखि स्याम मृदु गाता ॥

बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी ॥

देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता ॥

मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता ॥

जनि जननी मानहु जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना ॥

दो. रघुपति कर सन्देसु अब सुनु जननी धरि धीर।

अस कहि कपि गद गद भयु भरे बिलोचन नीर

॥ 13 ॥

श्लोक 21

कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भे बिपरीता ॥

नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू ॥

कुबलय बिपिन कुन्त बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा ॥

जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा ॥

कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई ॥

तत्त्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा ॥

सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतेनहि माहीम् ॥

प्रभु सन्देसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही ॥

कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता ॥

उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई ॥

दो. निसिचर निकर पतङ्ग सम रघुपति बान कृसानु।

जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु

॥ 14 ॥

श्लोक 22

जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलम्बु रघुराई ॥

रामबान रबि उएँ जानकी। तम बरूथ कहँ जातुधान की ॥

अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई ॥

कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित ऐहहिं रघुबीरा ॥

निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिम् ॥

हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना ॥

मोरें हृदय परम सन्देहा। सुनि कपि प्रगट कीन्ह निज देहा ॥

कनक भूधराकार सरीरा। समर भयङ्कर अतिबल बीरा ॥

सीता मन भरोस तब भयू। पुनि लघु रूप पवनसुत लयू ॥

दो. सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।

प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल

॥ 15 ॥

श्लोक 23

मन सन्तोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी ॥

आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना ॥

अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू ॥

करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना ॥

बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा ॥

अब कृतकृत्य भयुँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता ॥

सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुन्दर फल रूखा ॥

सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी ॥

तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीम् ॥

दो. देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।

रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु

॥ 16 ॥

श्लोक 24

चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरैं लागा ॥

रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे ॥

नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी ॥

खाएसि फल अरु बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे ॥

सुनि रावन पठे भट नाना। तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना ॥

सब रजनीचर कपि सङ्घारे। गे पुकारत कछु अधमारे ॥

पुनि पठयु तेहिं अच्छकुमारा। चला सङ्ग लै सुभट अपारा ॥

आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा ॥

दो. कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलेसि धरि धूरि।

कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि

॥ 17 ॥

श्लोक 25

सुनि सुत बध लङ्केस रिसाना। पठेसि मेघनाद बलवाना ॥

मारसि जनि सुत बान्धेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही ॥

चला इन्द्रजित अतुलित जोधा। बन्धु निधन सुनि उपजा क्रोधा ॥

कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा ॥

अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लङ्केस कुमारा ॥

रहे महाभट ताके सङ्गा। गहि गहि कपि मर्दि निज अङ्गा ॥

तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा।

मुठिका मारि चढ़आ तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई ॥

उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति न जाइ प्रभञ्जन जाया ॥

दो. ब्रह्म अस्त्र तेहिं साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।

जौं न ब्रह्मसर मानुँ महिमा मिटि अपार

॥ 18 ॥

श्लोक 26

ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहि मारा। परतिहुँ बार कटकु सङ्घारा ॥

तेहि देखा कपि मुरुछित भयू। नागपास बाँधेसि लै गयू ॥

जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बन्धन काटहिं नर ग्यानी ॥

तासु दूत कि बन्ध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा ॥

कपि बन्धन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब आए ॥

दसमुख सभा दीखि कपि जाई। कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई ॥

कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता ॥

देखि प्रताप न कपि मन सङ्का। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असङ्का ॥

दो. कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।

सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद

॥ 19 ॥

श्लोक 27

कह लङ्केस कवन तैं कीसा। केहिं के बल घालेहि बन खीसा ॥

की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। देखुँ अति असङ्क सठ तोही ॥

मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कि बाधा ॥

सुन रावन ब्रह्माण्ड निकाया। पाइ जासु बल बिरचित माया ॥

जाकें बल बिरञ्चि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा।

जा बल सीस धरत सहसानन। अण्डकोस समेत गिरि कानन ॥

धरि जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह ते सठन्ह सिखावनु दाता।

हर कोदण्ड कठिन जेहि भञ्जा। तेहि समेत नृप दल मद गञ्जा ॥

खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। बधे सकल अतुलित बलसाली ॥

दो. जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।

तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि

॥ 20 ॥

श्लोक 28

जानुँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई ॥

समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा ॥

खायुँ फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा ॥

सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी ॥

जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउ तनयँ तुम्हारे ॥

मोहि न कछु बाँधे कि लाजा। कीन्ह चहुँ निज प्रभु कर काजा ॥

बिनती करुँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन ॥

देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी ॥

जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई ॥

तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै ॥

दो. प्रनतपाल रघुनायक करुना सिन्धु खरारि।

गेँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि

॥ 21 ॥

श्लोक 29

राम चरन पङ्कज उर धरहू। लङ्का अचल राज तुम्ह करहू ॥

रिषि पुलिस्त जसु बिमल मंयका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलङ्का ॥

राम नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा ॥

बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषण भूषित बर नारी ॥

राम बिमुख सम्पति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई ॥

सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गे पुनि तबहिं सुखाहीम् ॥

सुनु दसकण्ठ कहुँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी ॥

सङ्कर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही ॥

दो. मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।

भजहु राम रघुनायक कृपा सिन्धु भगवान

॥ 22 ॥

श्लोक 30

जदपि कहि कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी ॥

बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी ॥

मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही ॥

उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना ॥

सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहुँ मूढ़ कर प्राना ॥

सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए।

नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता ॥

आन दण्ड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मन्त्र भल भाई ॥

सुनत बिहसि बोला दसकन्धर। अङ्ग भङ्ग करि पठिअ बन्दर ॥

दो. कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहुँ समुझाइ।

तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ

॥ 23 ॥

श्लोक 31

पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लि आइहि ॥

जिन्ह कै कीन्हसि बहुत बड़आई। देखेउँûमैं तिन्ह कै प्रभुताई ॥

बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भि सहाय सारद मैं जाना ॥

जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना ॥

रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ई पूँछ कीन्ह कपि खेला ॥

कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी ॥

बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी ॥

पावक जरत देखि हनुमन्ता। भयु परम लघु रुप तुरन्ता ॥

निबुकि चढ़एउ कपि कनक अटारीं। भी सभीत निसाचर नारीम् ॥

दो. हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।

अट्टहास करि गर्ज़आ कपि बढ़इ लाग अकास

॥ 24 ॥

श्लोक 32

देह बिसाल परम हरुआई। मन्दिर तें मन्दिर चढ़ धाई ॥

जरि नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला ॥

तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहि अवसर को हमहि उबारा ॥

हम जो कहा यह कपि नहिं होई। बानर रूप धरें सुर कोई ॥

साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरि नगर अनाथ कर जैसा ॥

जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीम् ॥

ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा ॥

उलटि पलटि लङ्का सब जारी। कूदि परा पुनि सिन्धु मझारी ॥

दो. पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि।

जनकसुता के आगें ठाढ़ भयु कर जोरि

॥ 25 ॥

श्लोक 33

मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा ॥

चूड़आमनि उतारि तब दयू। हरष समेत पवनसुत लयू ॥

कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा ॥

दीन दयाल बिरिदु सम्भारी। हरहु नाथ मम सङ्कट भारी ॥

तात सक्रसुत कथा सुनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु ॥

मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा ॥

कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना। तुम्हहू तात कहत अब जाना ॥

तोहि देखि सीतलि भि छाती। पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती ॥

दो. जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह।

चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह

॥ 26 ॥

श्लोक 34

चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्त्रवहिं सुनि निसिचर नारी ॥

नाघि सिन्धु एहि पारहि आवा। सबद किलकिला कपिन्ह सुनावा ॥

हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना ॥

मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचन्द्र कर काजा ॥

मिले सकल अति भे सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी ॥

चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा ॥

तब मधुबन भीतर सब आए। अङ्गद सम्मत मधु फल खाए ॥

रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे ॥

दो. जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज।

सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज

॥ 27 ॥

श्लोक 35

जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई ॥

एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गे कपि सहित समाजा ॥

आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा ॥

पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी ॥

नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना ॥

सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ।

राम कपिन्ह जब आवत देखा। किएँ काजु मन हरष बिसेषा ॥

फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई ॥

दो. प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुञ्ज।

पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कञ्ज

॥ 28 ॥

श्लोक 36

जामवन्त कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया ॥

ताहि सदा सुभ कुसल निरन्तर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर ॥

सोइ बिजी बिनी गुन सागर। तासु सुजसु त्रेलोक उजागर ॥

प्रभु कीं कृपा भयु सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू ॥

नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी ॥

पवनतनय के चरित सुहाए। जामवन्त रघुपतिहि सुनाए ॥

सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए ॥

कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की ॥

दो. नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।

लोचन निज पद जन्त्रित जाहिं प्रान केहिं बाट

॥ 29 ॥

श्लोक 37

चलत मोहि चूड़आमनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही ॥

नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी ॥

अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बन्धु प्रनतारति हरना ॥

मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्यागी ॥

अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना ॥

नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करिहिं हठि बाधा ॥

बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरि छन माहिं सरीरा ॥

नयन स्त्रवहि जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी।

सीता के अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला ॥

दो. निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।

बेगि चलिय प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति

॥ 30 ॥

श्लोक 38

सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना ॥

बचन काँय मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही ॥

कह हनुमन्त बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई ॥

केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी ॥

सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कौ सुर नर मुनि तनुधारी ॥

प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा ॥

सुनु सुत उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीम् ॥

पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता ॥

दो. सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमन्त।

चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवन्त

॥ 31 ॥

श्लोक 39

बार बार प्रभु चहि उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा ॥

प्रभु कर पङ्कज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा ॥

सावधान मन करि पुनि सङ्कर। लागे कहन कथा अति सुन्दर ॥

कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा ॥

कहु कपि रावन पालित लङ्का। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बङ्का ॥

प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना ॥

साखामृग के बड़इ मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई ॥

नाघि सिन्धु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा।

सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई ॥

दो. ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकुल।

तब प्रभावँ बड़वानलहिं जारि सकि खलु तूल

॥ 32 ॥

श्लोक 40

नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी ॥

सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी ॥

उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना ॥

यह संवाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा ॥

सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृन्दा। जय जय जय कृपाल सुखकन्दा ॥

तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा ॥

अब बिलम्बु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे ॥

कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी ॥

दो. कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ।

नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ

॥ 33 ॥

श्लोक 41

प्रभु पद पङ्कज नावहिं सीसा। गरजहिं भालु महाबल कीसा ॥

देखी राम सकल कपि सेना। चिति कृपा करि राजिव नैना ॥

राम कृपा बल पाइ कपिन्दा। भे पच्छजुत मनहुँ गिरिन्दा ॥

हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भे सुन्दर सुभ नाना ॥

जासु सकल मङ्गलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती ॥

प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीम् ॥

जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयु रावनहि सोई ॥

चला कटकु को बरनैं पारा। गर्जहि बानर भालु अपारा ॥

नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी ॥

केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीम् ॥

छं. चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।

मन हरष सभ गन्धर्ब सुर मुनि नाग किन्नर दुख टरे ॥

कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।

जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीम्

॥ 34 ॥

श्लोक 42

सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोही।

गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोही ॥

रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।

जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी

॥ 1 ॥

श्लोक 43

दो. एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।

जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर

॥ 2 ॥

श्लोक 44

उहाँ निसाचर रहहिं ससङ्का। जब ते जारि गयु कपि लङ्का ॥

निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा ॥

जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई ॥

दूतन्हि सन सुनि पुरजन बानी। मन्दोदरी अधिक अकुलानी ॥

रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी ॥

कन्त करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहु ॥

समुझत जासु दूत कि करनी। स्त्रवहीं गर्भ रजनीचर धरनी ॥

तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कन्त जो चहहु भलाई ॥

तब कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई ॥

सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार सम्भु अज कीन्हेम् ॥

दो. -राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक।

जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक

॥ 35 ॥

श्लोक 45

श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी ॥

सभय सुभाउ नारि कर साचा। मङ्गल महुँ भय मन अति काचा ॥

जौं आवि मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई ॥

कम्पहिं लोकप जाकी त्रासा। तासु नारि सभीत बड़इ हासा ॥

अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई ॥

मन्दोदरी हृदयँ कर चिन्ता। भयु कन्त पर बिधि बिपरीता ॥

बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिन्धु पार सेना सब आई ॥

बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू ॥

जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माही ॥

दो. सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।

राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास

॥ 36 ॥

श्लोक 46

सोइ रावन कहुँ बनि सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई ॥

अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा ॥

पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन ॥

जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरुप कहुँ हित ताता ॥

जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना ॥

सो परनारि लिलार गोसाईं। तजु चुथि के चन्द कि नाई ॥

चौदह भुवन एक पति होई। भूतद्रोह तिष्टि नहिं सोई ॥

गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहि न कोऊ ॥

दो. काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पन्थ।

सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि सन्त

॥ 37 ॥

श्लोक 47

तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला ॥

ब्रह्म अनामय अज भगवन्ता। ब्यापक अजित अनादि अनन्ता ॥

गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपासिन्धु मानुष तनुधारी ॥

जन रञ्जन भञ्जन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता ॥

ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भञ्जन रघुनाथा ॥

देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही ॥

सरन गेँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा ॥

जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन ॥

दो. बार बार पद लागुँ बिनय करुँ दससीस।

परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस ॥ 39(क) ॥

मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठी यह बात।

तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात ॥ 39(ख) ॥

माल्यवन्त अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना ॥

तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन ॥

रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हि कोऊ ॥

माल्यवन्त गृह गयु बहोरी। कहि बिभीषनु पुनि कर जोरी ॥

सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीम् ॥

जहाँ सुमति तहँ सम्पति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना ॥

तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता ॥

कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी ॥

दो. तात चरन गहि मागुँ राखहु मोर दुलार।

सीत देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार

॥ 38 ॥

श्लोक 48

बुध पुरान श्रुति सम्मत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी ॥

सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मुत्यु अब आई ॥

जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा ॥

कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाही ॥

मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती ॥

अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा ॥

उमा सन्त कि इहि बड़आई। मन्द करत जो करि भलाई ॥

तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा ॥

सचिव सङ्ग लै नभ पथ गयू। सबहि सुनाइ कहत अस भयू ॥

दो0=रामु सत्यसङ्कल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।

मै रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि

॥ 40 ॥

श्लोक 49

अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयूहीन भे सब तबहीम् ॥

साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी ॥

रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयु बिभव बिनु तबहिं अभागा ॥

चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीम् ॥

देखिहुँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता ॥

जे पद परसि तरी रिषिनारी। दण्डक कानन पावनकारी ॥

जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरङ्ग सङ्ग धर धाए ॥

हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मै देखिहुँ तेई ॥

दो0= जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।

ते पद आजु बिलोकिहुँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ

॥ 41 ॥

श्लोक 50

एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयु सपदि सिन्धु एहिं पारा ॥

कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कौ रिपु दूत बिसेषा ॥

ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए ॥

कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई ॥

कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा। कहि कपीस सुनहु नरनाहा ॥

जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया ॥

भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा ॥

सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी ॥

सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना ॥

दो0=सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।

ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि

॥ 42 ॥

श्लोक 51

कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजुँ नहिं ताहू ॥

सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीम् ॥

पापवन्त कर सहज सुभ्AU। भजनु मोर तेहि भाव न क्AU ॥

जौं पै दुष्टहृदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई ॥

निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा ॥

भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा ॥

जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनि निमिष महुँ तेते ॥

जौं सभीत आवा सरनाई। रखिहुँ ताहि प्रान की नाई ॥

दो0=उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।

जय कृपाल कहि चले अङ्गद हनू समेत

॥ 43 ॥

श्लोक 52

सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर ॥

दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानन्द दान के दाता ॥

बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी ॥

भुज प्रलम्ब कञ्जारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन ॥

सिङ्घ कन्ध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा ॥

नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता ॥

नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता ॥

सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा ॥

दो. श्रवन सुजसु सुनि आयुँ प्रभु भञ्जन भव भीर।

त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर

॥ 44 ॥

श्लोक 53

अस कहि करत दण्डवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा ॥

दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा ॥

अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी ॥

कहु लङ्केस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा ॥

खल मण्डलीं बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहि केहि भाँती ॥

मैं जानुँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती ॥

बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट सङ्ग जनि देइ बिधाता ॥

अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्ह जानि जन दाया ॥

दो. तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।

जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम

॥ 45 ॥

श्लोक 54

तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना ॥

जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा ॥

ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी ॥

तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीम् ॥

अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे ॥

तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला ॥

मैं निसिचर अति अधम सुभ्AU। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं क्AU ॥

जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा ॥

दो. -अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुञ्ज।

देखेउँ नयन बिरञ्चि सिब सेब्य जुगल पद कञ्ज

॥ 46 ॥

श्लोक 55

सुनहु सखा निज कहुँ सुभ्AU। जान भुसुण्डि सम्भु गिरिज्AU ॥

जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवे सभय सरन तकि मोही ॥

तजि मद मोह कपट छल नाना। करुँ सद्य तेहि साधु समाना ॥

जननी जनक बन्धु सुत दारा। तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा ॥

सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी ॥

समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीम् ॥

अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसि धनु जैसेम् ॥

तुम्ह सारिखे सन्त प्रिय मोरें। धरुँ देह नहिं आन निहोरेम् ॥

दो. सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।

ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम

॥ 47 ॥

श्लोक 56

सुनु लङ्केस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरेम् ॥

राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा ॥

सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी ॥

पद अम्बुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा ॥

सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अन्तरजामी ॥

उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही ॥

अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी ॥

एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिन्धु कर नीरा ॥

जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीम् ॥

अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भी अपारा ॥

दो. रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचण्ड।

जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखण्ड ॥ 49(क) ॥

जो सम्पति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ।

सोइ सम्पदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ ॥ 49(ख) ॥

अस प्रभु छाड़इ भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना ॥

निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा ॥

पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी ॥

बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक ॥

सुनु कपीस लङ्कापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गम्भीरा ॥

सङ्कुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती ॥

कह लङ्केस सुनहु रघुनायक। कोटि सिन्धु सोषक तव सायक ॥

जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई ॥

दो. प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि।

बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि

॥ 48 ॥

श्लोक 57

सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई ॥

मन्त्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा ॥

नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिन्धु करिअ मन रोसा ॥

कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा ॥

सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा ॥

अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिन्धु समीप गे रघुराई ॥

प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई ॥

जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए ॥

दो. सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह।

प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह

॥ 50 ॥

श्लोक 58

प्रगट बखानहिं राम सुभ्AU। अति सप्रेम गा बिसरि दुर्AU ॥

रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने ॥

कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अङ्ग भङ्ग करि पठवहु निसिचर ॥

सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए ॥

बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे ॥

जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना ॥

सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोडाए ॥

रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती ॥

दो. कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम सन्देसु उदार।

सीता देइ मिलेहु न त आवा काल तुम्हार

॥ 51 ॥

श्लोक 59

तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा ॥

कहत राम जसु लङ्काँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए ॥

बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता ॥

पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी ॥

करत राज लङ्का सठ त्यागी। होइहि जब कर कीट अभागी ॥

पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई ॥

जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयु मृदुल चित सिन्धु बिचारा ॥

कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी ॥

दो. -की भि भेण्ट कि फिरि गे श्रवन सुजसु सुनि मोर।

कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर

॥ 52 ॥

श्लोक 60

नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसेम् ॥

मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा ॥

रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना ॥

श्रवन नासिका काटै लागे। राम सपथ दीन्हे हम त्यागे ॥

पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई ॥

नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी ॥

जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा ॥

अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला ॥

दो. द्विबिद मयन्द नील नल अङ्गद गद बिकटासि।

दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवन्त बलरासि

॥ 53 ॥

श्लोक 61

ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनि को नाना ॥

राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रेलोकहि गनहीम् ॥

अस मैं सुना श्रवन दसकन्धर। पदुम अठारह जूथप बन्दर ॥

नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीम् ॥

परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा ॥

सोषहिं सिन्धु सहित झष ब्याला। पूरहीं न त भरि कुधर बिसाला ॥

मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा ॥

गर्जहिं तर्जहिं सहज असङ्का। मानहु ग्रसन चहत हहिं लङ्का ॥

दो. -सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम।

रावन काल कोटि कहु जीति सकहिं सङ्ग्राम

॥ 54 ॥

श्लोक 62

राम तेज बल बुधि बिपुलाई। तब भ्रातहि पूँछेउ नय नागर ॥

तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पन्थ कृपा मन माहीम् ॥

सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा ॥

सहज भीरु कर बचन दृढ़आई। सागर सन ठानी मचलाई ॥

मूढ़ मृषा का करसि बड़आई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई ॥

सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकेम् ॥

सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ई। समय बिचारि पत्रिका काढ़ई ॥

रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बचाइ जुड़आवहु छाती ॥

बिहसि बाम कर लीन्ही रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन ॥

दो. -बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस।

राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस ॥ 56(क) ॥

की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पङ्कज भृङ्ग।

होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतङ्ग ॥ 56(ख) ॥

सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई ॥

भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा ॥

कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़इ प्रकृति अभिमानी ॥

सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा ॥

अति कोमल रघुबीर सुभ्AU। जद्यपि अखिल लोक कर र्AU ॥

मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकु धरिही ॥

जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे।

जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही ॥

नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिन्धु रघुनायक जहाँ ॥

करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई ॥

रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयु रहा मुनि ग्यानी ॥

बन्दि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा ॥

दो. बिनय न मानत जलधि जड़ गे तीन दिन बीति।

बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति

॥ 55 ॥

श्लोक 63

लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू ॥

सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुन्दर नीती ॥

ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी ॥

क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा। ऊसर बीज बेँ फल जथा ॥

अस कहि रघुपति चाप चढ़आवा। यह मत लछिमन के मन भावा ॥

सङ्घानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अन्तर ज्वाला ॥

मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जन्तु जलनिधि जब जाने ॥

कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयु तजि माना ॥

दो. काटेहिं पि कदरी फरि कोटि जतन कौ सीञ्च।

बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पि नव नीच

॥ 57 ॥

श्लोक 64

सभय सिन्धु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे ॥

गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कि नाथ सहज जड़ करनी ॥

तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रन्थनि गाए ॥

प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अही। सो तेहि भाँति रहे सुख लही ॥

प्रभु भल कीन्ही मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही ॥

ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी ॥

प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़आई ॥

प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जौ तुम्हहि सोहाई ॥

दो. सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।

जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ

॥ 58 ॥

श्लोक 65

नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई ॥

तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे ॥

मैं पुनि उर धरि प्रभुताई। करिहुँ बल अनुमान सहाई ॥

एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ ॥

एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी ॥

सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा ॥

देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयु सुखारी ॥

सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बन्दि पाथोधि सिधावा ॥

छं. निज भवन गवनेउ सिन्धु श्रीरघुपतिहि यह मत भायू।

यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायू ॥

सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना ॥

तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि सन्तत सठ मना ॥

दो. सकल सुमङ्गल दायक रघुनायक गुन गान।

सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिन्धु बिना जलजान

॥ 59 ॥

श्लोक 66

मासपारायण, चौबीसवाँ विश्राम

इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने

पञ्चमः सोपानः समाप्तः ।

(सुन्दरकाण्ड समाप्त)