Stotram - Sacred Scripture

Sri Hari Stotram (Jagajjalapalam)

Sri Hari Stotram (Jagajjalapalam)

Stotram
Unknown
9 Verses
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श्री हरि स्तोत्रम् (जगज्जालपालम्)

श्लोक 1

जगज्जालपालं कनत्कण्ठमालं

शरच्चन्द्रफालं महादैत्यकालम् ।

नभोनीलकायं दुरावारमायं

सुपद्मासहायं भजेऽहं भजेऽहम्

श्लोक 2

सदाम्भोधिवासं गलत्पुष्पहासं

जगत्सन्निवासं शतादित्यभासम् ।

गदाचक्रशस्त्रं लसत्पीतवस्त्रं

हसच्चारुवक्त्रं भजेऽहं भजेऽहम्

॥ 1 ॥

श्लोक 3

रमाकण्ठहारं श्रुतिव्रातसारं

जलान्तर्विहारं धराभारहारम् ।

चिदानन्दरूपं मनोज्ञस्वरूपं

धृतानेकरूपं भजेऽहं भजेऽहम्

॥ 2 ॥

श्लोक 4

जराजन्महीनं परानन्दपीनं

समाधानलीनं सदैवानवीनम् ।

जगज्जन्महेतुं सुरानीककेतुं

त्रिलोकैकसेतुं भजेऽहं भजेऽहम्

॥ 3 ॥

श्लोक 5

कृताम्नायगानं खगाधीशयानं

विमुक्तेर्निदानं हरारातिमानम् ।

स्वभक्तानुकूलं जगद्वृक्षमूलं

निरस्तार्तशूलं भजेऽहं भजेऽहम्

॥ 4 ॥

श्लोक 6

समस्तामरेशं द्विरेफाभकेशं

जगद्बिम्बलेशं हृदाकाशवेशम् ।

सदा दिव्यदेहं विमुक्ताखिलेहं

सुवैकुण्ठगेहं भजेऽहं भजेऽहम्

॥ 5 ॥

श्लोक 7

सुरालीबलिष्ठं त्रिलोकीवरिष्ठं

गुरूणां गरिष्ठं स्वरूपैकनिष्ठम् ।

सदा युद्धधीरं महावीरवीरं

भवाम्भोधितीरं भजेऽहं भजेऽहम्

॥ 6 ॥

श्लोक 8

रमावामभागं तलालग्ननागं

कृताधीनयागं गतारागरागम् ।

मुनीन्द्रैस्सुगीतं सुरैस्सम्परीतं

गुणौघैरतीतं भजेऽहं भजेऽहम्

॥ 7 ॥

श्लोक 9

फलश्रुति ।

इदं यस्तु नित्यं समाधाय चित्तं

पठेदष्टकं कण्ठहारं मुरारेः ।

स विष्णोर्विशोकं ध्रुवं याति लोकं

जराजन्मशोकं पुनर्विन्दते नो

॥ 8 ॥

श्लोक 10

इति श्री परमहंसस्वामि ब्रह्मानन्दविरचितं श्रीहरिस्तोत्रम् ॥

श्री हरि स्तोत्रम् (जगज्जालपालम्) | (Sri Hari Stotram (Jagajjalapalam)) Lyrics | Vedic Tithi