Chalisa - Sacred Scripture

Sri Durga Chalisa

Sri Durga Chalisa

Chalisa
Durga
39 Verses
110%

श्री दुर्गा चालीसा

श्लोक 1

नमो नमो दुर्गे सुख करनी ।

नमो नमो अम्बे दुःख हरनी

श्लोक 2

निरङ्कार है ज्योति तुम्हारी ।

तिहू लोक फैली उजियारी

॥ 1 ॥

श्लोक 3

शशि ललाट मुख महाविशाला ।

नेत्र लाल भृकुटि विकराला

॥ 2 ॥

श्लोक 4

रूप मातु को अधिक सुहावे ।

दरश करत जन अति सुख पावे

॥ 3 ॥

श्लोक 5

तुम संसार शक्ति लय कीना ।

पालन हेतु अन्न धन दीना

॥ 4 ॥

श्लोक 6

अन्नपूर्णा हुयि जग पाला ।

तुम ही आदि सुन्दरी बाला

॥ 5 ॥

श्लोक 7

प्रलयकाल सब नाशन हारी ।

तुम गौरी शिव शङ्कर प्यारी

॥ 6 ॥

श्लोक 8

शिव योगी तुम्हरे गुण गावेम् ।

ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावेम्

॥ 7 ॥

श्लोक 9

रूप सरस्वती का तुम धारा ।

दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा

॥ 8 ॥

श्लोक 10

धरा रूप नरसिंह को अम्बा ।

परगट भयि फाड के खम्बा

॥ 9 ॥

श्लोक 11

रक्षा कर प्रह्लाद बचायो ।

हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो

॥ 10 ॥

श्लोक 12

लक्ष्मी रूप धरो जग माहीम् ।

श्री नारायण अङ्ग समाहीम्

॥ 11 ॥

श्लोक 13

क्षीरसिन्धु में करत विलासा ।

दयासिन्धु दीजै मन आसा

॥ 12 ॥

श्लोक 14

हिङ्गलाज में तुम्हीं भवानी ।

महिमा अमित न जात बखानी

॥ 13 ॥

श्लोक 15

मातङ्गी धूमावति माता ।

भुवनेश्वरी बगला सुखदाता

॥ 14 ॥

श्लोक 16

श्री भैरव तारा जग तारिणी ।

छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी

॥ 15 ॥

श्लोक 17

केहरि वाहन सोह भवानी ।

लाङ्गुर वीर चलत अगवानी

॥ 16 ॥

श्लोक 18

कर में खप्पर खडग विराजे ।

जाको देख काल डर भाजे

॥ 17 ॥

श्लोक 19

तोहे कर में अस्त्र त्रिशूला ।

जाते उठत शत्रु हिय शूला

॥ 18 ॥

श्लोक 20

नगरकोटि में तुम्हीं विराजत ।

तिहुँ लोक में डङ्का बाजत

॥ 19 ॥

श्लोक 21

शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे ।

रक्तबीज शङ्खन संहारे

॥ 20 ॥

श्लोक 22

महिषासुर नृप अति अभिमानी ।

जेहि अघ भार मही अकुलानी

॥ 21 ॥

श्लोक 23

रूप कराल कालिका धारा ।

सेन सहित तुम तिहि संहारा

॥ 22 ॥

श्लोक 24

पडी भीढ सन्तन पर जब जब ।

भयि सहाय मातु तुम तब तब

॥ 23 ॥

श्लोक 25

अमरपुरी अरु बासव लोका ।

तब महिमा सब कहें अशोका

॥ 24 ॥

श्लोक 26

ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी ।

तुम्हें सदा पूजें नर नारी

॥ 25 ॥

श्लोक 27

प्रेम भक्ति से जो यश गावेम् ।

दुःख दारिद्र निकट नहिं आवेम्

॥ 26 ॥

श्लोक 28

ध्यावे तुम्हें जो नर मन लायि ।

जन्म मरण ते सौं छुट जायि

॥ 27 ॥

श्लोक 29

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी ।

योग न होयि बिन शक्ति तुम्हारी

॥ 28 ॥

श्लोक 30

शङ्कर आचारज तप कीनो ।

काम अरु क्रोध जीत सब लीनो

॥ 29 ॥

श्लोक 31

निशिदिन ध्यान धरो शङ्कर को ।

काहु काल नहिं सुमिरो तुमको

॥ 30 ॥

श्लोक 32

शक्ति रूप को मरम न पायो ।

शक्ति गयी तब मन पछतायो

॥ 31 ॥

श्लोक 33

शरणागत हुयि कीर्ति बखानी ।

जय जय जय जगदम्ब भवानी

॥ 32 ॥

श्लोक 34

भयि प्रसन्न आदि जगदम्बा ।

दयि शक्ति नहिं कीन विलम्बा

॥ 33 ॥

श्लोक 35

मोको मातु कष्ट अति घेरो ।

तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो

॥ 34 ॥

श्लोक 36

आशा तृष्णा निपट सतावेम् ।

रिपु मूरख मॊहि अति दर पावैम्

॥ 35 ॥

श्लोक 37

शत्रु नाश कीजै महारानी ।

सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी

॥ 36 ॥

श्लोक 38

करो कृपा हे मातु दयाला ।

ऋद्धि-सिद्धि दे करहु निहाला । 38 ॥

जब लगि जियू दया फल पावू ।

तुम्हरो यश मैं सदा सुनावू

॥ 37 ॥

श्लोक 39

दुर्गा चालीसा जो गावै ।

सब सुख भोग परमपद पावै

॥ 39 ॥

श्लोक 40

देवीदास शरण निज जानी ।

करहु कृपा जगदम्ब भवानी ॥