Stotram - Sacred Scripture

Devi Aswadhati (Amba Stuti)

Devi Aswadhati (Amba Stuti)

Stotram
Unknown
13 Verses
110%

देवी अश्वधाटी (अम्बा स्तुति)

श्लोक 1

(कालिदास कृतम्)

चेटी भवन्निखिल खेटी कदम्बवन वाटीषु नाकि पटली

कोटीर चारुतर कोटी मणीकिरण कोटी करम्बित पदा ।

पाटीरगन्धि कुचशाटी कवित्व परिपाटीमगाधिप सुता

घोटीखुरादधिक धाटीमुदार मुख वीटीरसेन तनुताम्

श्लोक 2

॥ 1 ॥ शा ॥

द्वैपायन प्रभृति शापायुध त्रिदिव सोपान धूलि चरणा

पापापह स्वमनु जापानुलीन जन तापापनोद निपुणा ।

नीपालया सुरभि धूपालका दुरितकूपादुदन्चयतुमाम्

रूपाधिका शिखरि भूपाल वंशमणि दीपायिता भगवती

श्लोक 3

॥ 2 ॥ शा ॥

यालीभि रात्मतनुतालीनकृत्प्रियक पालीषु खेलति भवा

व्याली नकुल्यसित चूली भरा चरण धूली लसन्मणिगणा ।

याली भृति श्रवसि ताली दलं वहति यालीक शोभि तिलका

साली करोतु मम काली मनः स्वपद नालीक सेवन विधौ

श्लोक 4

॥ 3 ॥ शा ॥

बालामृतांशु निभ फालामना गरुण चेला नितम्ब फलके

कोलाहल क्षपित कालामराकुशल कीलाल शोषण रविः ।

स्थूलाकुचे जलद नीलाकचे कलित वीला कदम्ब विपिने

शूलायुध प्रणति शीला दधातु हृदि शैलाधि राज तनया

श्लोक 5

॥ 4 ॥ शा ॥

कम्बावतीव सविडम्बा गलेन नव तुम्बाभ वीण सविधा

बिम्बाधरा विनत शम्बायुधादि निकुरुम्बा कदम्ब विपिने ।

अम्बा कुरङ्ग मदजम्बाल रोचि रिह लम्बालका दिशतु मे

शं बाहुलेय शशि बिम्बाभि राम मुख सम्बाधिता स्तन भरा

श्लोक 6

॥ 5 ॥ शा ॥

दासायमान सुमहासा कदम्बवन वासा कुसुम्भ सुमनो

वासा विपञ्चि कृत रासा विधूत मधु मासारविन्द मधुरा ।

कासार सून तति भासाभिराम तनु रासार शीत करुणा

नासा मणि प्रवर भासा शिवा तिमिर मासाये दुपरतिम्

श्लोक 7

॥ 6 ॥ शा ॥

न्यङ्काकरे वपुषि कङ्काल रक्त पुषि कङ्कादि पक्षि विषये

त्वं कामना मयसि किं कारणं हृदय पङ्कारि मे हि गिरिजाम् ।

शङ्काशिला निशित टङ्कायमान पद सङ्काशमान सुमनो

झङ्कारि भृङ्गतति मङ्कानुपेत शशि सङ्काश वक्त्र कमलाम्

श्लोक 8

॥ 7 ॥ शा ॥

जम्भारि कुम्भि पृथु कुम्भापहासि कुच सम्भाव्य हार लतिका

रम्भा करीन्द्र कर दम्भापहोरुगति डिम्भानुरञ्जित पदा ।

शम्भा उदार परिरम्भाङ्कुरत् पुलक दम्भानुराग पिशुना

शं भासुराभरण गुम्भा सदा दिशतु शुम्भासुर प्रहरणा

श्लोक 9

॥ 8 ॥ शा ॥

दाक्षायणी दनुज शिक्षा विधौ विकृत दीक्षा मनोहर गुणा

भिक्षाशिनो नटन वीक्षा विनोद मुखि दक्षाध्वर प्रहरणा ।

वीक्षां विधेहि मयि दक्षा स्वकीय जन पक्षा विपक्ष विमुखी

यक्षेश सेवित निराक्षेप शक्ति जय लक्षावधान कलना

श्लोक 10

॥ 9 ॥ शा ॥

वन्दारु लोक वर सन्धायिनी विमल कुन्दावदात रदना

बृन्दारु बृन्द मणि बृन्दारविन्द मकरन्दाभिषिक्त चरणा ।

मन्दानिला कलित मन्दार दामभिरमन्दाभिराम मकुटा

मन्दाकिनी जवन भिन्दान वाचमरविन्दानना दिशतु मे

श्लोक 11

॥ 10 ॥ शा ॥

यत्राशयो लगति तत्रागजा भवतु कुत्रापि निस्तुल शुका

सुत्राम काल मुख सत्रासकप्रकर सुत्राण कारि चरणा ।

छत्रानिलातिरय पत्त्राभिभिराम गुण मित्रामरी सम वधूः

कु त्रासहीन मणि चित्राकृति स्फुरित पुत्रादि दान निपुणा

श्लोक 12

॥ 11 ॥ शा ॥

कूलातिगामि भय तूलावलिज्वलनकीला निजस्तुति विधा

कोलाहलक्षपित कालामरी कुशल कीलाल पोषण रता ।

स्थूलाकुचे जलद नीलाकचे कलित लीला कदम्ब विपिने

शूलायुध प्रणति शीला विभातु हृदि शैलाधिराज तनया

श्लोक 13

॥ 12 ॥ शा ॥

इन्धान कीर मणिबन्धा भवे हृदयबन्धा वतीव रसिका

सन्धावती भुवन सन्धारणे प्यमृत सिन्धावुदार निलया ।

गन्धानुभाव मुहुरन्धालि पीत कच बन्धा समर्पयतु मे

शं धाम भानुमपि रुन्धान माशु पद सन्धान मप्यनुगता

श्लोक 14

॥ 13 ॥ शा ॥