Chalisa - Sacred Scripture

Hanuman Chalisa

Hanuman Chalisa

Chalisa
Hanuman
40 Verses
110%

हनुमान् चालीसा

श्लोक 1

दोहा

श्री गुरु चरण सरोज रज निजमन मुकुर सुधारि ।

वरणौ रघुवर विमलयश जो दायक फलचारि ॥

बुद्धिहीन तनुजानिकै सुमिरौ पवन कुमार ।

बल बुद्धि विद्या देहु मोहि हरहु कलेश विकार ॥

ध्यानम्

अतुलित बलधामं स्वर्ण शैलाभ देहम् ।

दनुज वन कृशानुं ज्ञानिना मग्रगण्यम् ॥

सकल गुण निधानं वानराणा मधीशम् ।

रघुपति प्रिय भक्तं वातजातं नमामि ॥

गोष्पदीकृत वाराशिं मशकीकृत राक्षसम् ।

रामायण महामाला रत्नं वन्दे-(अ)निलात्मजम् ॥

यत्र यत्र रघुनाथ कीर्तनं तत्र तत्र कृतमस्तकाञ्जलिम् ।

भाष्पवारि परिपूर्ण लोचनं मारुतिं नमत राक्षसान्तकम् ॥

मनोजवं मारुत तुल्यवेगम् ।

जितेन्द्रियं बुद्धि मतां वरिष्टम् ॥

वातात्मजं वानरयूथ मुख्यम् ।

श्री राम दूतं शिरसा नमामि ॥

चौपाई

जय हनुमान ज्ञान गुण सागर ।

जय कपीश तिहु लोक उजागर

श्लोक 2

रामदूत अतुलित बलधामा ।

अञ्जनि पुत्र पवनसुत नामा

॥ 1 ॥

श्लोक 3

महावीर विक्रम बजरङ्गी ।

कुमति निवार सुमति के सङ्गी

॥ 2 ॥

श्लोक 4

कञ्चन वरण विराज सुवेशा ।

कानन कुण्डल कुञ्चित केशा

॥3 ॥

श्लोक 5

हाथवज्र औ ध्वजा विराजै । [और]

कान्थे मूञ्ज जनेवू साजै

॥ 4 ॥

श्लोक 6

शङ्कर सुवन केसरी नन्दन । [शङ्कर स्वयं]

तेज प्रताप महाजग वन्दन

॥ 5॥

श्लोक 7

विद्यावान गुणी अति चातुर ।

राम काज करिवे को आतुर

॥ 6 ॥

श्लोक 8

प्रभु चरित्र सुनिवे को रसिया ।

रामलखन सीता मन बसिया

॥ 7 ॥

श्लोक 9

सूक्ष्म रूपधरि सियहि दिखावा ।

विकट रूपधरि लङ्क जलावा

॥ 8॥

श्लोक 10

भीम रूपधरि असुर संहारे ।

रामचन्द्र के काज संवारे

॥ 9 ॥

श्लोक 11

लाय सञ्जीवन लखन जियाये ।

श्री रघुवीर हरषि उरलाये

॥ 10 ॥

श्लोक 12

रघुपति कीन्ही बहुत बडायी (ई) ।

तुम मम प्रिय भरत सम भायी

॥ 11 ॥

श्लोक 13

सहस्र वदन तुम्हरो यशगावै ।

अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावै

॥ 12 ॥

श्लोक 14

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीशा ।

नारद शारद सहित अहीशा

॥ 13 ॥

श्लोक 15

यम कुबेर दिगपाल जहां ते ।

कवि कोविद कहि सके कहां ते

॥ 14 ॥

श्लोक 16

तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा ।

राम मिलाय राजपद दीन्हा

॥ 15 ॥

श्लोक 17

तुम्हरो मन्त्र विभीषण माना ।

लङ्केश्वर भये सब जग जाना

॥ 16 ॥

श्लोक 18

युग सहस्र योजन पर भानू ।

लील्यो ताहि मधुर फल जानू

॥ 17 ॥

श्लोक 19

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही ।

जलधि लाङ्घि गये अचरज नाही

॥ 18 ॥

श्लोक 20

दुर्गम काज जगत के जेते ।

सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते

॥ 19 ॥

श्लोक 21

राम दुआरे तुम रखवारे ।

होत न आज्ञा बिनु पैसारे

॥ 20 ॥

श्लोक 22

सब सुख लहै तुम्हारी शरणा ।

तुम रक्षक काहू को डर ना

॥ 21 ॥

श्लोक 23

आपन तेज सम्हारो आपै ।

तीनों लोक हाङ्क ते काम्पै

॥ 22 ॥

श्लोक 24

भूत पिशाच निकट नहि आवै ।

महवीर जब नाम सुनावै

॥ 23 ॥

श्लोक 25

नासै रोग हरै सब पीरा ।

जपत निरन्तर हनुमत वीरा

॥ 24 ॥

श्लोक 26

सङ्कट से हनुमान छुडावै ।

मन क्रम वचन ध्यान जो लावै

॥ 25 ॥

श्लोक 27

सब पर राम तपस्वी राजा ।

तिनके काज सकल तुम साजा

॥ 26 ॥

श्लोक 28

और मनोरथ जो कोयि लावै ।

तासु अमित जीवन फल पावै

॥ 27 ॥

श्लोक 29

चारो युग प्रताप तुम्हारा ।

है प्रसिद्ध जगत उजियारा

॥ 28 ॥

श्लोक 30

साधु सन्त के तुम रखवारे ।

असुर निकन्दन राम दुलारे

॥ 29 ॥

श्लोक 31

अष्ठसिद्धि नव निधि के दाता ।

अस वर दीन्ह जानकी माता

॥ 30 ॥

श्लोक 32

राम रसायन तुम्हारे पासा ।

सदा रहो रघुपति के दासा

॥ 31 ॥

श्लोक 33

॥ 32 ॥ [सादर हो]

तुम्हरे भजन रामको पावै ।

जन्म जन्म के दुख बिसरावै

श्लोक 34

अन्त काल रघुपति पुरजायी । [रघुवर]

जहां जन्म हरिभक्त कहायी

॥ 33 ॥

श्लोक 35

और देवता चित्त न धरयी ।

हनुमत सेयि सर्व सुख करयी

॥ 34 ॥

श्लोक 36

सङ्कट क(ह)टै मिटै सब पीरा ।

जो सुमिरै हनुमत बल वीरा

॥ 35 ॥

श्लोक 37

जै जै जै हनुमान गोसायी ।

कृपा करहु गुरुदेव की नायी

॥ 36 ॥

श्लोक 38

यह शत वार पाठ कर कोयी । [जो]

छूटहि बन्दि महा सुख होयी

॥ 37 ॥

श्लोक 39

जो यह पडे हनुमान चालीसा ।

होय सिद्धि साखी गौरीशा

॥ 38 ॥

श्लोक 40

तुलसीदास सदा हरि चेरा ।

कीजै नाथ हृदय मह डेरा

॥ 39 ॥

श्लोक 41

दोहा

पवन तनय सङ्कट हरण - मङ्गल मूरति रूप् ।

राम लखन सीता सहित - हृदय बसहु सुरभूप् ॥

सियावर रामचन्द्रकी जय । पवनसुत हनुमानकी जय । बोलो भायी सब सन्तनकी जय ।